FLOWERS-A FASCINATING ORGANS OF ANGIOSPERMS

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फूल (Flower) – आवृत्तबीजी पौधों का एक आकर्षक अंग

(FLOWERS- A FASCINATING ORGANS OF ANGIOSPERMS) 

  • फूल सुंदरता, प्रेम और शांति के प्रतीक हैं। वे बगीचे की आत्मा बनते हैं और मनुष्य को प्रकृति का संदेश देते हैं।
  • फूल सौन्दर्यपरक, सजावटी, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य की वस्तुएँ हैं।
  • इनका उपयोग प्यार, ख़ुशी, दुःख, शोक आदि व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
  • भारत में, फूलों को पवित्र किया जाता है और आमतौर पर घरों और मंदिरों में पूजा में उपयोग किया जाता है।
  • फूलों का उपयोग सभी उत्सवों, विवाहों और धार्मिक समारोहों में किया जाता है। सभी सामाजिक कार्यों में फूल-मालाओं का प्रयोग प्रतीकात्मक हो गया है।
  • आमतौर पर उगाए जाने वाले फूलों में Carnation, Aster, Clendula, Petunia, Pansy, Nasturtium, Phlox, Zinnia, Marigold आदि हैं।
  • कुछ अन्य फूल जो आमतौर पर बगीचों में उगाए जाते हैं, वे हैं Antirrhinum, Portulaca, Chrysanthemum, Dahlia, Cosmos, Larkspur, Poppy, Stock, Sweet pea, Sweet william, Verbena. ।
  • सामान्य बल्बनुमा फूल Narcissus, Iris, Spider lily, Nerine, Tulips आदि हैं।
  • फूलों की खेती (Floriculture) सजावटी बागवानी की शाखा है जो फूलों और सजावटी पौधों की खेती और विपणन के साथ-साथ फूलों की व्यवस्था से संबंधित है।

फूल (Flower) –

FLOWER-WITH-MOTHER-AXIS
 FLOWER-WITH-MOTHER-AXIS

 

  • पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह या कली है, जो तने या शाखाओं के शीर्ष अथवा पत्ती के कक्ष में उत्पन्न होकर प्रजनन का कार्य करता है तथा फल एवं बीज को उत्पादित करता है।
  • इसे पौधे के जनन अंग के रूप में जाना जाता है।
  • इसकी उत्पत्ति पुष्पकलिका (Flower Bud) से होती है।
  • यह वास्तविक रूप से प्ररोह (Shoot) का रूपान्तरण है।
  • पुष्प में सामान्य रूप से एक डण्ठल पाया जाता है, जिसे पुष्पवृन्त (Pedicel) कहा जाता है।जिस पुष्प में
  • (i) पुष्पवृन्त होता है, उसे सवृन्त फूल कहते हैं।
  • (ii) पुष्पवृन्त नहीं होता है, उसे वृन्तहीन फूल कहते हैं।

फूल में सामान्यतः चार अवयवों का समूह होता है, जो अलग-अलग चक्रों में व्यवस्थित रहता है। ये चारों चक्र फूल में जहाँ लगे होते हैं, उसे पुष्पासन (Thalmus) कहते हैं।

PARTS-OF-FLOWER
B. PARTS-OF-FLOWER

 

फूल के चारों चक्र के अवयव हैं-

  • सहायक चक्र (Accessory Whorl) – इस वर्ग में बाह्यदल एवं दल को रखते हैं। सहायक अंग पुष्प के वे अंग होते हैं जो जनन में भाग न लेकर उनको सुरक्षा देते हैं तथा पुष्प को आकर्षक बनाते हैं जिससे इनमें जन्तु परागण हो सके।

     (i) वाह्यदलपुंज (Calyx)

     (ii) दलपुंज (Corolla)

  • अनिवार्य चक्र (Essential Whorl) / जनन अंग (Reproductive organs)- इस वर्ग में पत्र पुष्प के वे अंग आते हैं, जो जनन की क्रिया में भाग लेते हैं। पुमंग तथा जायांग को इसी वर्ग में रखा जाता है। ये भाग लैंगिक जनन द्वारा फल तथा बीज का उत्पादन करते हैं। 

     (iii) पुमंग (Androecium) एवं 

     (iv) जयांग (Gynoecium)।

 पुष्प के इन अनिवार्य चक्र को सामान्य रूप से जनन चक्र कहते हैं।

 पुष्प के प्रमुख अवयव एवं उसके गुण :

1. वाह्यदलपुंज (Calyx) :-

  • यह फूल का सबसे नीचे स्थित एवं पहला चक्र है।
  • इसमें हरी तथा छोटी-छोटी पत्तियों जैसी संरचना होती है।
  • पुष्पासन  पर स्थित पुष्पीय पत्रों के प्रथम चक्र को बाह्यदलपुंज कहते हैं।
  • इस पुंज या चक्र का एक सदस्य बाह्यदल (Sepal) कहलाता है।
  • सामान्यतः ये छोटे तथा हरे रंग के होते हैं, लेकिन कभी-कभी ये आकर्षक और रंगीन हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें दलाभ (Petaloid) कहते हैं।
  • कुछ पुष्पपत्रों के बाह्यदल अलग-अलग स्थित होते हैं, इन्हें पृथक् बाह्यदलीय (Polysepalous) कहते हैं (उदाहरण- सरसों)
  • जबकि कुछ में बाह्यदल आपस में जुड़े होते हैं, तब इन्हें संयुक्त बाह्यदलीय (Gamosepalous) कहते हैं (उदाहरण- गेंदा)।
  • जब ये पुष्प के खिलते ही गिर जाते हैं तब इन्हें शीघ्रपाती (Caducous) (उदाहरण-पीली कँटेरी) तथा जब अधिक समय तक लगे रहते हैं तब पर्णपाती (Deciduous) (उदाहरण- बैंगन, मटर) कहते हैं लेकिन जब ये पुष्प से कभी नहीं गिरते तब, अपाती (Persistent) कहलाते हैं।
  • इसके निम्न कार्य हैं-                                                                                                      (i) प्रकाश संश्लेषण करना एवं                                                                                        (ii) पुष्प के अन्य भागों की रक्षा, कली की अवस्था में करना।

2. दलपुंज (Corolla):

  • पुष्प के पुष्पासन पर स्थित पुष्प  पत्रों के दूसरे चक्र को दलपुंज तथा इसके एक सदस्य को दल (Petal) कहते हैं।
  • ये सामान्यतः आकर्षक रंगों में पाये जाते हैं। इनका आकर्षक रंग, सुगन्ध तथा मकरन्द कोष से निकलने वाला मकरन्द (Nectar) कीटों को आकर्षित करके पर परागण होने की क्रिया को प्रेरित करता है।
  • बाह्यदल के ही समान ये भी पृथक्दलीय (Polypetalous), संयुक्तदलीय (Gamopetalous), शीघ्रपाती (Caducous), पर्णपाती (Deciduous) या चिरलग्न (Persistent) हो सकते हैं।
  • कुछ दल बाह्यदल के समान हरे होते हैं, तब इन्हें बाह्यदलाभ (Sepaloid) कहते हैं।

    NOTE – 

    परिदलपुंज (PERIANTH)

    • कुछ पौधों के बाह्यदल एवं दल एक समान होते हैं ऐसी स्थिति में इन्हें संयुक्त रूप से परिदलपुंज (PERIANTH) तथा अलग परिदल (Tepal) कहते हैं। 
    • बाह्यदल के ही समान ये भी पृथक् परिदलीय (Polyphyllous) अथवा संयुक्त परिदलीय (Gamophyllous) हो सकते हैं।
    • कभी-कभी परिदलपुंज दल के समान रंगीन होते हैं तब इन्हें दलाभ (Petaloid) परिदलपुंज कहते हैं लेकिन कभी- कभी ये बाह्यदल के समान हरे होते हैं तब इन्हें बाह्यदलाभ (Sepaloid) परिदलपुंज कहते हैं।
    • ग्रैमिनी (घास कुल) तथा लिलिएसी कुल के पादपों में परिदलपुंज पाये जाते हैं।

3. पुमंग (Androceium) :

STEMEN
                                           STEMEN
  • यह नर अंग का निर्माण करता है, इसे फूल का तीसरा चक्र कहा जाता है।
  • पुमंग की इकाई पुंकेसर (Stamen) कहलाता है।
  • सामान्यतः पुंकेसर के तीन प्रमुख भाग होते हैं-                                                               (i) पुतन्तु (Filament)                                                                                               (ii) परागकोष (Anther) एवं                                                                                     (iii) योजी (Connective)
  • परागकोष में चार परागकोष्ठ (Pollen Sacs) होते है, जिसमें परागकण (Pollen Grains) भरा रहता है।

4. जयांग (Gynoecium):

  • यह मादा जनन अंग (Female Reproductive Organ) का निर्माण करता है।
  • इसे पुष्प का चौथा चक्र कहा जाता है।
  • यह सामान्य रूप से फूल के मध्य भाग में स्थित रहता है, जो मादा बीजाणु (Female Egg) पैदा करता है।
  • जयांग की इकाई को सामान्य रूप से अण्डप (Pistil) कहते हैं।
CARPEL
D. CARPEL
  • प्रत्येक अण्डप के मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं-

    (i) वर्त्तिकाग्र (Stigma)

    (ii) वर्त्तिका (Style) एवं

    (iii) अण्डाशय (Ovary)

(i) वर्त्तिका (Stigma):

  • वर्तिका के शिखर पर घुण्डी के आकार की संरचना वर्त्तिकाग्र होती है।
  • पतली नली के आकार की सीधी रचना वर्त्तिका होती है।
  • यह अण्डाशय से ही निकलती है।

(ii) वर्त्तिकाग्र (Style) :

  • जब वर्त्तिकाग्र परिपक्व हो जाता है, तो यह चिपचिपा हो जाता है, जिससे परागकण उसपर चिपक जाते हैं।

(iii) अण्डाशय (Ovary) :

  • अण्डाशय सामान्यतः अण्डप के आधार पर एक बंद कक्ष (Chamber) के रूप में होता है, जिसमें बीजाण्ड (Ovule) की कतारें लगी रहती हैं।
  • सामान्य रूप से बीजाण्ड के भीतर का अधिकांश भाग बीजाण्डकाय (Nucellus) का बना होता है।
  • इस बीजाण्ड के ऊपरी भाग में एक छिद्र होता है, जिसे बीजाण्ड-द्वार (Micropyle) कहते हैं
  • बीजाण्ड-द्वार के विपरीत भाग वाला सिरा निभाग (Chalaza) कहलाता है।
  • बीजाण्डकाय में एक थैलीनुमा रचना होती है, जिसे भ्रूणकोष (Embryo Sac) कहते हैं।
  • भ्रूणकोष में कोशिकाओं का समूह होता है। इस समूह के बीच वाली बड़ी कोशा को अण्ड-कोशा (Egg-cell) कहते हैं।

 

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