जलक्रमक (Hydrosere)

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प्रकृति में पारिस्थितिक अनुक्रमण शुष्क वास स्थान के साथ-साथ जल से परिपूर्ण वातावरण जैसे तालाब, झील एवं अन्य जलीय तन्त्रों में भी होता है। जलीय तन्त्र में होने वाला अनुक्रमण जलक्रमक (Hydrosere) कहलाता है। जल अनुक्रमण विभिन्न अवस्थाओं को कम गहराई वाले जलाशयों के किनारे खड़े होकर आसानी से अवलोकित किया जा सकता है।

जलक्रमक के चरण (Stage of Hydrosere )

अग्रगामी समुदाय से चरम समुदाय के स्थायित्व के बीच जलक्रमक के विभिन्न समुदाय के प्रभावी पौधों के रूपों के आधार पर इस अनुक्रमण को अनेक अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है जो कि निम्नलिखित है – 

  • पादप प्लवक अवस्था (Phytoplankton stage)
  • मूल आरोपित निमग्नावस्था (Rooted sub merged stage)
  • प्लावन अवस्था (Floating stage)
  • नड अनूप या दलदली अवस्था (Reed swamp stage)
  • नरकट या कच्छ शाद या दलदली घास अवस्था (Sedge or Marsh meadow stage)
  • गुल्म अवस्था (Woodland stage)
  • चरम अवस्था (Climax Stage or Forest stage)

Stage of Hydrosere

1. पादप प्लवक अवस्था (Phytoplankton stage)–

जलीय अनुक्रमण में प्रथम समुदाय के रूप में सर्वप्रथम विभिन्न प्रकार के पादप प्लवक जैसे-नीलहरित शैवाल (Blue green algae), हरित शैवाल (Algae), डायटम्स (Diatoms) आदि अग्रगामी समुदाय (Pioneer community) का निर्माण करते हैं। इन जीवों में प्रजनन सम्बन्धी संरचनाएँ जैसे- बीजाणु आदि हवा या अन्य माध्यम से जलाशयों में पहुँचकर अंकुरित होते हैं एवं अनुकूल वातावरण मिलने पर इनमें वृद्धि तथा जनन होता है। 

ऐसी स्थिति निर्मित होते ही आस-पास के वातावरण से जन्तुप्लवक भी आते-जाते हैं तथा उनमें एवं पादप प्लवकों के बीच एक सन्तुलन कायम हो जाता है, क्योंकि जन्तु प्लवक पादप प्लवक को खाकर अपना जीवनयापन करते हैं। इन जीवों की मृत्यु तथा उनके अंगों के सड़ने-गलने से कार्बनिक पदार्थों में वृद्धि होती है जो जलाशय के तत्व में स्थित मृदा से मिलकर हल्की मिट्टी बनाते हैं जो कि अगली अवस्था के आगमन हेतु वातावरण निर्मित करते हैं।

2. मूल आरोपित निमग्नावस्था (Rooted sub merged stage)-

पादप प्लवक की तीव्र वृद्धि दर तथा उनकी मृत्यु, अपघटन से निर्मित कीचड़ की मुलायम पतली परत में जलमग्न पौधे जैसे- हाइड्रिला (Hydrilla), पोटै मोजिटॉन (Potamogeton), वैलिस्तेरिया (Vallisnaria), यूट्रिकुलेरिया (Utrict laria), इलो डि या (Elodea), सेरै टोफाइलम .(Ceratophyllum) आदि अपने प्रवर्द्धकों के माध्यम से आकर वृद्धि करने लगते हैं। इन पौधों की वृद्धि एवं मृत्यु के साथ-साथ अंगों के अपघटन से तली में कार्बनिक पदार्थ 5 और अधिक मात्रा में जमा होने लगते हैं, जिसके फलस्वरूप तल के कीचड़ की परत और मोटी हो जाती है तथा जलाशय अपेक्षाकृत छिछला बनता जाता है। इन परिवर्तनों के कारण नए पौधों के लिए यह वास-स्थान उपयुक्त हो जाता है जो । अगली अवस्था को उत्पन्न करते हैं।

3. प्लावन अवस्था (Floating stage)-

जल स्रोत में जल की गहराई 2 से 5 फीट की रह जाती है, तो ऐसी स्थिति में जड़ युक्त प्लावी पौधे (Rooted floating plants) जैसे निलम्बो (Nelumbo), निम्फिया (Nymphaea), सिंघाड़ा (Trapa) आदि आरोपित हो जाते हैं। इनकी जड़ें कीचड़ में तथा चौड़ी पत्तियाँ पानी की सतह पर तैरती रहती हैं। इसके साथ स्वतन्त्र प्लावित पौधे (Free floating plants) जैसे एजोला (Azolla), लेम्ना (Lemna), साल्विनिया (Salvinia), जलकुम्भी (Eichornia), पिस्टिया (Pistia) आदि जल की सतह पर छा जाते हैं। इन पौधों की अधिकता के कारण निमग्न पौधों को समुचित प्रकाश नहीं मिल पाता है तथा वे धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। 

4. नड अनूप या दलदली अवस्था (Reed swamp stage)-

इसे उभयचर अवस्था (Amphibion stage) भी कहते हैं। यह अवस्था 1-4 फुट पानी की गहराई वाली स्थिति में अपनी उपस्थिति दर्शाती है। इस श्रेणी में सिरपस (Scirpus), सैजिटेरिया (Sagittaria), टायफा (Typha), फै गमाइटिस (Phragmites) आदि पौधे आते हैं। इस समुदाय के पौधों की जड़ें तल के नीचे रहती हैं, लेकिन प्ररोह का ज्यादातर भाग जल के ऊपर हवा में रहता है। इन पौधों में भोजन निर्माण, श्वसन, प्रकाश-संश्लेषण आदि क्रियाएँ सामान्य पौधों की तरह ही होती हैं। 

इस वर्ग के पौधों में वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की क्रिया तीव्र गति से होती है एवं ये बहुत ज्यादा खाद-मिट्टी या ह्यूमस ये (Humus) जमा करते हैं। ये सघन जलीय वनस्पति का निर्माण करते हैं। ये जल में बहते हुए अवसादी पदार्थों को रोककर और पादप अवशेषों को संचित कर किनारों को भरते रहते हैं। जल स्रोत में जल की मात्रा और कम होने से अनुक्रम की अगली अवस्था उपस्थित होने लगती है।

5. नरकट या कच्छ शाद या दलदली घास अवस्था (Sedge or Marsh meadow stage)-

जलाशयों के किनारे के हल्के गीले अथवा दलदली स्थिति में होने पर इस अवस्था के पौधे वृद्धि करते हैं। साइप्रेसी (Cyperaceae) तथा प्रैमिनी (Gramineae) कुल के कुछ पौधे जैसे-कैरेक्स (Carex), जन्कस (Juncus), साइप्रस (Cyperus), इलियोकैरिस (Eleocharis) आदि इस अवस्था के प्रमुख पौधे हैं। आगे चलकर कुछ अन्य लम्बी घासें एवं शाकीय पौधे जैसे डायकैन्थियम (Dicanthium), कैम्पैनुला (Campanula), पॉलिगोनम (Polygonum) आदि प्रवेश करते हैं।

6. गुल्म अवस्था (Woodland stage)-

अनुक्रमण की उपर्युक्त विभिन्न अवस्थाओं के कारण विकसित हुए स्थान पर अनेक स्थलीय सूप एवं वृक्ष प्रकृति के पौधे उगते हैं। एल्नस (Almus), पॉप्युलस (Populus), सैलिक्स (Salix), सिफैलेंथस (Cephalanthus), कॉर्नस (Cormus) जैसे पौधे प्रमुखता से वृद्धि करते हैं। इस अवस्था में मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या में अत्यन्त वृद्धि हो जाती है। भूमि में इस अवस्था के पौधों द्वारा काफी तीव्र गति से खनिजीकरण (Mineraliza tion) किया जाता है जिसके कारण वृक्षों की नई-नई जातियाँ प्रकट होने लगती हैं तथा अनुक्रमण चरम अवस्था की ओर अग्रसर होता है।

7. चरम अवस्था (Climax Stage or Forest stage)-

जलक्रमक अपनी परिणति इस अवस्था में दर्शाता है। जैसे-जैसे भूमि में ह्यूमस, जीवाणुओं, कवकों, अन्य जीवों एवं खनिज तत्वों में अभिवृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे विभिन्न प्रकार के वृक्ष अपनी उपस्थिति दर्शाते जाते हैं। आगे चलकर अनेक वृक्ष प्रजातियाँ सघन रूप से विकसित होकर जंगल अथवा वन का निर्माण करती हैं। अधिक वर्षा वाले उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में वर्षा वन, मध्यम वृष्टिपात वाले क्षेत्रों में सदाबहार वन (Evergreen forest) एवं शीतोष्ण क्षेत्र में मिश्रित वन (Mixed forest) विकसित होते हैं। 

पौधों के साथ प साथ जन्तुओं में भी क्रमिक परिवर्तन होता रहता है। त संरचनात्मक परिवर्तनों में जीवों की जातियों के प्रकार एवं संख्या तथा कार्यात्मक परिवर्तनों में स्वपोषियों एवं परपोषियों हैं के बीच के सम्बन्धों का अनुक्रमण पर मुख्य प्रभाव पड़ता है। एक बार चरम अवस्था के अन्तर्गत वन परितन्त्र (Forest ecosystem) के सुस्थापित हो जाने के पश्चात नये तरह के प्रभावी वृक्ष जातियों का आना रूक जाता है तथा अनुक्रमण अपनी पूर्णता को पा जाता है।

जल अनुक्रमण से सम्बंधित सवाल :-

  • जलक्रमक क्या है?
  • जल अनुक्रमण को समझाइए।
  • जलक्रमक की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
  • जलक्रमक पर टिप्पणी
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